रचना चोरों की शामत

Saturday, 15 October 2016

गागर में सागर-५ लघुकथाएँ

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सहेलियाँ
गहरे मेकअप और वज़नदार वस्त्राभूषणों से लदी-फँदी ये चारों सहेलियाँ वैसे तो मिलते ही चहकने लगती थीं और बातों से फुर्सत ही नहीं मिलती थी, लेकिन आज पास-पास बैठी होने के बावजूद इन्हें आपस में बातें करने की फुर्सत नहीं थी क्योंकि आज वे एक विवाह समारोह में शामिल होने के लिए आई थीं। लेकिन हाँ, बार-बार अपने पर्स से छोटा सा आइना निकालकर विभिन्न कोणों से खुद को निहारने के बाद कुछ सुनने की चाह में कनखियों से एक दूसरी को अवश्य देख लेती थीं। 

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टाट का पैबंद

“आहा! कितना शानदार भवन बनवाया है सुमि! आनंद आ गया... बहुत बहुत बधाई सखी...” गृहप्रवेश के अवसर पर न आ सकने पर खेद प्रगट करती हुई निर्मला बोली।
-कोई बात नहीं निम्मो, सबकी अपनी-अपनी व्यस्तताएँ होती हैं। कहते हुए सुमि ने निम्मो का हाथ अपने हाथ में लिया और बड़े उत्साह के साथ बातें करती हुई पूरा घर दिखाने लगी।
सुमि, क्या तुमने जॉब छोड़ दिया है”? घर की साज सज्जा से प्रभावित निम्मो ने पूछा।
-नहीं तो...
“फिर इतने बड़े घर की साज-सज्जा, रख-रखाव पर कैसे ध्यान दे पाती हो”?
सुमन कुछ कहती उससे पहले ही निर्मला की नज़रें अचानक उसके शयनकक्ष की दीवार पर अटक गईं तो हैरत में पड़कर बोली-
“अरे सुमि, यह क्या, अपने शयनकक्ष में तुमने यह एक दराज वाला इतना छोटा सा दर्पण, क्यों लगा रखा है? क्या तुमने अलग से शृंगार-कक्ष नहीं बनवाया? इतने सुंदर घर में यह तो मखमल में टाट के पैबंद जैसा महसूस हो रहा है”
-इसमें हैरानी की कोई बात नहीं निम्मो, अगर यह टाट का पैबंद न होता तो क्या मेरा घर मखमल बना रह सकता था? चलो नाश्ता करते हैं...।

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कमाल है!

अपनी सहेली रीना से मिलने आई मीता सोफा पर बैठी ही थी कि एक छोटा सा सुंदर कुत्ता आकर उसके पैरों को चाटने लगा। मीता घबराकर उठ खड़ी हुई और उसे धकेलने लगी, लेकिन रीना के नो जिमी, कम ऑन हियर कहते ही वो उसकी तरफ चला गया।
-कमाल है!...मीता बोल पड़ी
रीना खुशी से फूलकर कुप्पा हो गई और बताने लगी कि उसके प्रशिक्षण पर कितनी मेहनत और खर्च किया है। फिर कुत्ते की उपलब्धियाँ गिनाने लगी-
“गो देअर जिमी” ...कुत्ता रीना की इंगित दिशा में चला गया।
-कमाल है!
“टेक दिज़ जिमी”...कुत्ते ने खिलौना ले लिया।
-कमाल है!
लेकिन जब मीता ने कुत्ते को “इधर आओ जिमी” कहकर बुलाया तो वो चुपचाप बैठा रहा। उसने रीना से इसका कारण पूछा तो उसने गर्व से बताया कि हमने इसे अंग्रेज़ी में प्रशिक्षण दिलवाया है, तभी कुत्ता रसोई की तरफ देखते हुए भौंकने लगा।
“इसे अब भूख लगी है, खाना माँग रहा है”। हँसते हुए रीना ने घोषणा की।
-कमाल है! लेकिन यह तो खाना अपनी मातृभाषा में ही माँग रहा है रीना, अगर अंग्रेज़ी में माँगता तो मैं भी तुम्हारे प्रशिक्षण का लोहा मान जाती!   

 
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गृह-प्रवेश

“मित्रवर! कल हमारे गृह-प्रवेश के शुभ अवसर पर आयोजित स्नेह-भोज में तुम्हारी सपरिवार उपस्थिति अनिवार्य है...” कहते हुए विमल ने  एक सुंदर सा निमंत्रण-पत्र कमल की ओर बढ़ा दिया।
“अवश्य मित्र, तुम्हारी खुशी में शामिल होने मैं न आऊँ, यह कैसे हो सकता है?” मुस्कुराते हुए कमल ने उत्तर दिया।
 एक ही दफ्तर में एक जैसे पद पर कार्यरत विमल और कमल में गाढ़ी मित्रता थी। दोनों के विचार काफी मिलते थे केवल एक ही बात पर मतभेद था-रिश्वत लेनान लेना...।    
अति सुंदर और सुसज्जित महलनुमा भवन के उदघाटन के बाद कमल ने नम्रतापूर्वक शुभकामनाओं के साथ लाए हुए उपहार का पैकेट विमल की ओर बढ़ाकर विदा ली।
उत्सुक विमल ने सबसे पहले उसी का उपहार खोला तो एक छोटा सा सुंदर स्वर्णिम फ्रेम वाला दमकता हुआ दर्पण  देखकर उसका चमकता हुआ चेहरा विवर्ण हो गया।  
  

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चेहरा
बार-बार समझाने के बावजूद जब विभा ने उसकी बात नहीं मानी तो जाने-माने साहित्यकारों के सम्मान समारोह में आमंत्रित प्रथम पंक्ति में अपनी सहेली के साथ बैठी हुई आभा अकेली ही उस मंच की ओर बढ़ गई जहाँ पीछे की तरफ कार्यक्रम के कार्यकर्ता साहित्यकारों को निर्धारित शुल्क पर हर श्रेणी के सम्मान बेचकर आगे मंचासीन करवा रहे थे। कुछ ही देर में आभा हाथ में श्रीफल, गले में गुलहार और कंधों पर शॉल लपेटे गर्व से सिर ऊँचा किए हुए ओजमय चेहरा लिए विभा के पास पहुँच गई लेकिन विभा ने उसे देखकर ऐसी मुखमुद्रा बनाई जैसे उसे पहचाना ही नहीं। वो विभा को झिंझोड़कर बोली-
“तुम्हें क्या हुआ सखी, देखा नहीं कि मेरा कितना सम्मान हुआ? इंटरव्यू, कविता पाठ की वीडियो रिकार्डिंग, आहा! मन को  कितना सुकून पहुँचा, तुम भी चलती तो...”
विभा ने चुपचाप अपना बैग खोला और एक छोटा सा आईना निकालकर आभा के सामने करके बोली-

“यह क्या तुम्हारा ही चेहरा है आभा?” 


-कल्पना रामानी

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कथा-सम्मान

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कथाबिम्ब का जनवरी-मार्च अंक(पुरस्कार का विवरण)

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