रचना चोरों की शामत

Saturday, 21 January 2017

नसीब अपना अपना

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वृद्धाश्रम में शाम के समय तीन बुजुर्ग महिलाओं में चर्चा चल रही थी
पहली- आप यहाँ कब से हैं बहन, अकेली हैं?
दूसरी- हम यहाँ नए हैं, कल ही आए हैं, पति भी साथ हैं, और आप?
पहली- हम भी तो कल ही आए हैं, वे उधर हैं अपने साथियों में...उसने पुरुष बुजुर्गों की तरफ इशारा किया। आपका परिवार  कहाँ है, आपके यहाँ आने का क्या कारण है?

दूसरी- मेरे दो बेटे हैं, पर दोनों विदेश में सेवा कार्य कर रहे हैं तथा पत्नी और बच्चों में व्यस्त हैं।  हमारे लिए उनके पास समय नहीं है। अब न तो साथ रखना चाहते हैं न ही यहाँ आने पर हमारे साथ रहना उनको अच्छा लगता है। जब हमें अकेले ही रहना है तो अपने जैसों के बीच ही क्यों न रहें, यही सोचकर हम अपना घर बेचकर यहाँ आ गए। और आप यहाँ कैसे आए?

पहली- मेरे भी दो बेटे हैं, सेवा तो अपने देश की ही कर रहे हैं, लेकिन दोनों ने घर का बँटवारा करके अलग होने के बाद हमें भी बाँटना चाहा, लेकिन इस चलाचली की बेला में हम अलग-अलग कैसे रह सकते हैं? जब नसीब में सुख ही नहीं है तो एक साथ रहकर दुख झेलना बेहतर जानकर हम अपनी इच्छा से यहाँ आ गए।

  तीसरी महिला चुपचाप विचारमग्न होकर उनकी बातें सुन रही थी,  इस बार दोनों ने उससे भी यहाँ आने का कारण जानना चाहा तो वो मुदित-मुद्रा में सगर्व  बोली-


  “हमारी तो एक ही बेटी है बहनों और अपने विवाह के बाद वो हमें नज़रों के सामने रखकर हमारी देखभाल करना चाहती है तो हमारा बड़ा घर बिकवाकर अपने घर के नजदीक छोटा लेकिन सुंदर घर खरीद दिया है। आज ही उसका फोन आया है कि घर में हमारी आवश्यकता और सुविधानुसार फर्नीचर का कार्य पूरा हो गया है और वो हमें अपने पति के साथ लेने आ रही है”। 

-कल्पना रामानी

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-कल्पना रामानी

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कथा-सम्मान

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कथाबिम्ब का जनवरी-मार्च अंक(पुरस्कार का विवरण)

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